by - praveen

29 Jul 2019


उत्तराखंड

आशीष सुन्दरियाल

हिमालय की सुरम्य उपत्यकाओं में स्थित उत्तराखंड को देवभूमि, तपोभूमि, स्वर्ग भूमि आदि अनेक नामों से वर्णित किया गया है। विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ ‘ऋग्वेद’ के दशम मंडल में इस भू-भाग को हिमवंत पर्वत कहा गया है।

यस्येम हिमवन्तो महित्वायश्य समुद्ररस या सहायु।

यस्ये मामदि सोयस्त बाहु कस्म देवयाह विसाविधेम।।

अर्थात,

हे ! हिमवंत पर्वत, जिसकी महिमा हम गाते हैं, जिसके महत्व की घोषणा रसों के साथ समुद्र कर रहा है, जिसकी सामर्थ्य की अभिव्यक्ति ये प्रार्दशाएं बाहुवत कर रही हैं, उस देव की हम हमेशा प्रार्थना करते हैं।

हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं एवं अविरल बहती सुर-सरिताओं से अलंकृत देवभूमि उत्तराखंड युग - युगांतर से धर्म एव आस्था का केंद्र बिंदु रहा है। देव, यक्ष, किन्नर सभी इसके अलौकिक एव अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य पर मुग्ध थे। सृष्टि की रचना इसी स्थान पर की गयी थी। स्कंदपुराण के केदारखंड मे कहा गया है

पुरातनो यथाह वेतथा स्थाने मिदंकिल, यदासृष्टि क्रियोचमे वेबहुमूर्ति नाम।

स्थित मत्रैव सतंत पर ब्रह्म जिगीषया, तदादिक मिदंस्थान देवना पिदुर्लभम।।

अर्थात,

जैसे मैं प्राचीन हूँ, उसी प्रकार यह केदार खंड भी सबसे प्राचीन है। जब मैं ब्रह्म मूर्तिधारण कर पृथ्वी में प्रविष्ट हुआ तब मैंने इसी स्थान पर सृष्टि की रचना की।

धर्म, ज्ञान, मुक्ति आदि में आस्था रखने वाले मनुष्य के लिए इस दिव्य भूमि का विशेष महत्व रहा है। इस भूमि को पुण्य एव मोक्ष की प्राप्ति का अलौकिक अंचल स्वीकार उकरते हुए महर्षि लिखते हैं 

केदार दर्शनादेवः मुक्ति पुंसकेणा स्थितः

इसी तरह स्कंदपुराण बद्रीकाश्रम महात्म्य में कहा गया है-

क्षेत्र दर्शन मात्रेण प्राणि नांनास्ति पातकं

अर्थात,

इस तपो भूमि के दर्शन मात्र से ही मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं।

देवभूमि, तपोभूमि, स्वर्गभूमि आदि नामों से वर्णित यह सिद्ध क्षेत्र आराधना एवं उपासना के लिए सर्वोत्तम माना गया है। अनेक ऋषि-मुनियों ने इस भूमि को अपनी तपस्थली बनाकर वेद - पुराणों एवं स्मृतियों की रचना की है। कालांतर में यही आराधना स्थल देवस्थानों के रूप में प्रतिष्ठित हो गए तथा तीर्थ-मंदिरों के रूप में प्रसिद्ध हुए। 

उत्तराखंड में सहस्रों सिद्धमंदिर हैं जिनका सैकड़ों वर्षों का इतिहास है। धार्मिक, आध्यात्मिक व पौराणिक दृष्टि से यह अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। इन मंदिरों की दिव्यता व भव्यता दोनों ही जनमानस को आकर्षित करती हैं। धर्म-अध्यात्म की ओर प्रवृत मानव के लिए ये मंदिर पूजा-अर्चना, ध्यान, धारणा व समाधि के सोपान हैं। जहाँ एक ओर इन मंदिरों की वास्तुकला व शिल्पकला शोधार्थिओं को अचम्भित करती है वहीं लोक मानस में प्रचलित जनश्रुतियां इन्हें रहस्यमयी बना देती हैं। रुद्रप्रयाग जनपद के उखीमठ तहसील के अंतर्गत गुप्तकाशी के निकट नारायण कोटी, ह्यूण तथा नालाचट्टी में ऐसे ही धार्मिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व के मन्दिर समूह विद्यमान हैं जो पौराणिक महत्ता के साथ-साथ अपनी विशिष्ट शिल्पशैली के लिए भी प्रसिद्ध हैं।

 

नारायणकोटी मन्दिर समूह

रुद्रप्रयाग-केदारनाथ यात्रा मार्ग पर गुप्तकाशी से तीन किलोमीटर की दूरी पर नारायणकोटी गांव स्थित है। इस स्थान को भीतू चट्टी के नाम से भी जाना जाता है। केदारघाटी स्थित यह भूभाग एक पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व के मंदिर समूह के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि नारायणकोटी में किसी समय 360 मन्दिरों का समूह था। कालांतर में अनेक भौगोलिक परिवर्तनों के कारण अधिकांश मंदिर ध्वस्त हो गए। वर्तमान में, इस स्थान पर 29 पाषाण निर्मित मंदिर विद्यमान हैं।

लक्ष्मी नारायण मन्दिर इस समूह का प्रधान मंदिर है। यह मंदिर पंचायतन शैली में निर्मित है। मुख्य मंदिर के चारों कोनां पर चार कर्णप्रासाद भी निर्मित किये गए हैं। पूर्वाभिमुख यह मंदिर, तलछंद योजना में गर्भगृह, कपिली तथा अर्धमंडपयुक्त है। गर्भगृह वर्गाकार है। गर्भगृह का वितान अलंकृत है। गर्भगृह की दीवार का अग्रभाग कपिली का निमार्ण करता है, जो कि बहुत ही सरल है। दो स्तम्भों पर आलम्बित लघुमंडप भी वर्गाकार आकृति में बनाया गया है। मंडप का वितान समतल एवं सरल है। उर्ध्वछन्द में मंदिर लगभग सात मीटर ऊँचा है। सरल वेदीबन्ध के ऊपर त्रिरथ जंघा भाग नितांत सादा है। जंघाभाग, शिखर से एक चन्द्रशाला पट्टी द्वारा विभक्त है। त्रिरथ नाग शिखर कर्णों पर पांच भूमि आमलकों से सुसज्जित है। शिखर का शीर्षभाग आमलक, कलश व बिजौरा से शोभित है। मंदिर का प्रवेश द्वार ऊँचे उदंबर से युक्त है। द्वार भूषा अत्यंत ही सरल है। उत्तरांग पर चतुर्भुजी वामावर्त गणेश का अंकन है तथा गर्भगृह में गरुड़ वाहन के साथ श्री लक्ष्मी नारायण की प्रतिमा स्थापित है।

लक्ष्मी नारायण मंदिर के प्रांगण में ही कुछ अन्य छोटे मंदिर भी अवस्थित हैं। मान्यता है कि यह स्थान नारायण के ही अनेक रूपों का देव कुल है और ये देव कुलिकायें इसी देवकुल के अनेक गणों से सम्बद्ध हैं। स्थानीय किंदंतियों के अनुसार लक्ष्मी नारायण मंदिर समूह में एक भस्मासुर का मंदिर भी है। मुख्य मंदिर परिसर में पृष्ठ भाग में स्थित भस्मासुर के मंदिर का शिखर गज पृष्ठा कृतिका है। गृभगृह आयताकार है तथा इसमें कर्ण प्रासाद भी नहीं हैं। 

मंदिर समूह के समीप ही, दो जल की धारायें निरंतर प्रवाहित होती रहती हैं, जिन्हें गंगा व यमुना के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इसी स्थल पर नवग्रहों के मंदिर भी अवस्थित हैं। इन सभी का तल विन्यास रेखायुक्त है तथा इनमें गर्भगृह व अर्धमंडप का प्राविधान है। शैली एवं निर्माण काल की दृष्टि से ये मंदिर १०वीं से लेकर १२वीं शताब्दी के निर्मित माने जाते हैं।

इसके अतिरिक्त, इस मंदिर समूह के निकट ही, लगभग चालीस मीटर की दूरी पर दो अन्य मंदिर स्थित हैं, जो श्री सत्यनारायण एवं श्री वीरभद्र के हैं। इन मंदिरों के तल छंद योजना में वर्गाकार गर्भगृह एवं अंतराल के प्राविधान है। ऊर्ध्वछंद योजना में, शिखर क्षैतिज पट्टियों से निर्मित है। वामपार्श में निर्मित श्री सत्यनारायण मंदिर में चार पाषाण प्रतिमाएं विद्यमान हैं। श्री वीरभद्र मंदिर में शिवलिंग स्थापित है जिसके ऊपर वर्तमान में तामपत्र से जलाभिषेक होता रहता है। इन दोनों मंदिरों के पार्श्व भाग में तीन देव कुलिकाएँ बनी हुईं हैं तथा श्री वीरभद्र मंदिर के बाहर वीरभद्र का वाहन नन्दी प्रतिष्ठित है। 

इस मंदिर समूह से लगभग 500 मीटर दूरी की एक प्राचीन जल कुंड स्थित है। थोड़ी सी ढलान वाले रास्ते से इस जल कुंड तक पंहुचा जा सकता है। इस सम्पूर्ण जलकुंड के बाहरी व भीतरी परिदृश्य पर नौ मंदिर उभरे हुए हैं। विद्वानों ने इस जल कुंड को हिमालय में बौद्धधर्म के पदचिन्हों के रूप में भी वर्णित किया है। अंग्रेज-आइरिश सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक, शिक्षक एवं स्वामी विवेकानन्द की शिष्या ‘निवेदिता’ ने अपनी पुस्तक ’फुटफॉल्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री’ में इस जलकुंड का उल्लेख हुए लिखा है कि ’भीतू चट्टी में जलाशय के ऊपर चौत्य आकार का जो घर बना है, उसकी बौद्ध ढंग की रचना तथा उसके द्वार पर बना हुआ गणेश सूचित करता है कि इस क्षेत्र में यह सबसे प्राचीन वस्तु है। बुद्ध के निर्वाण के दिन से ही बौद्ध प्रचारक हिमवंत में आते रहे हैं और बौद्ध धर्म का प्रचार करते रहे हैं। किन्तु उनके कार्य के चिह्न अब लुप्त हो चुके हैं। अब केवल गोपेश्वर में माता का मंदिर जो चौत्य के आकार का बना है, भीतू चट्टी के जलाशय पर चौत्याकार घेरा, जोशीमठ में नौ देवियों का मंदिर तथा नाला में स्तूप से बदल कर बना हुआ मंदिर, केवल यही चिह्न बौद्ध धर्म के बच सके हैं।

वर्तमान में इन मंदिरों में नियमित पूजा का कोई विधान नहीं है परन्तु स्थानीय ग्रामीण समय समय पर यहाँ पूजा- अर्चना व अनुष्ठान करते रहते हैं।

 

दमयंती मन्दिर

    हिमालय की पावन दिव्य भूमि का धर्म एवं धार्मिक स्थानों के परिप्रेक्ष्य में अपना एक विशिष्ट स्थान है। इस भूमि पर विद्यमान सहस्रों प्राचीन मंदिर आज भी धर्म व आस्था के साथ-साथ शोध के विषय के रूप में जनमानस को उद्वेलित करते आये हैं। इसी श्रृंखला में,  रुद्रप्रयाग-केदारनाथ यात्रा मार्ग पर गुप्तकाशी से लगभग दो किलो मीटर की दूरी पर स्थित ह्यूण गांव का दमयंती मन्दिर भी धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व का एक प्राचीन मंदिर है।

महर्षिव्यास कृत महाकाव्य महाभारत में वर्णित नलोपाख्यान उपपर्व के अनुसार,  विदर्भ देश में भीष्मक नाम के एक राजा राज्य करते थे। उनकी पुत्री का नाम दमयन्ती था। दमयन्ती लक्ष्मी के समान रूपवती थी। उन्हीं दिनों निषध देश में वीरसेन के पुत्र नल राज्य करते थे। वे बड़े ही गुणवान, सत्यवादी तथा ब्राह्मण भक्त थे। निषध देश से जो लोग विदर्भ देश में आते थे,  वे महाराज नल के गुणों की प्रशंसा करते थे। यह प्रशंसा दमयन्ती के कानों तक भी पहुँची थी। इसी तरह विदर्भ देश से आने वाले लोग राजकुमारी के रूप और गुणों की चर्चा महाराज नल के समक्ष करते। इसका परिणाम यह हुआ कि नल और दमयन्ती एक-दूसरे के प्रति आकृष्ट होते गये।

दमयन्ती का स्वयंवर हुआ। जिसमें न केवल धरती के राजा, बल्कि देवता भी आ गए। नल भी स्वयंवर में जा रहा था। देवताओं ने उसे रोक कर कहा कि वो स्वयंवर में न जाए। उन्हें यह बात पहले से पता थी कि दमयंती नल को ही चुनेगी। सभी देवताओं ने भी नल का रूप धर लिया। स्वयंवर में एक साथ कई नल खड़े थे। सभी परेशान थे कि असली नल कौन होगा। लेकिन दमयंती जरा भी विचलित नहीं हुई, उसने बड़ी बुद्धिमत्ता से असली नल को पहचान लिया और अपना जीवनसाथी चुन लिया। सभी देवताओं ने उनका अभिवादन किया। नव-दम्पति को देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त हु्आ। दमयन्ती निषध नरेश राजा नल की महारानी बनी। दोनों बड़े सुख से समय बिताने लगे। परन्तु समय सदा एकसा नहीं रहता, दुःख-सुख का चक्र निरन्तर चलता ही रहता है। वैसे तो महाराज नल गुणवान व धर्मात्मा थे,  किन्तु उन में एक दोष था - जुए का व्यसन। नल के एक भाई का नाम पुष्कर था। वह नल से अलग रहता था। उसने उन्हें जुए के लिए आमन्त्रित किया। खेल आरम्भ हुआ। भाग्य प्रतिकूल था। नल हारने लगे, सोना, चाँदी, रथ, राजपाट सब हाथ से निकल गया।

नल जुए में अपना सर्वस्व हार गये। उन्होंने अपने शरीर के सारे वस्त्राभूषण उतार दिये। केवल एक वस्त्र पहनकर नगर से बाहर निकले। दमयन्ती ने भी मात्र एक साड़ी में पति का अनुसरण किया। एक दिन राजा नल ने सोने के पंख वाले कुछ पक्षी देखे। राजा नल ने सोचा,  यदि इन्हें पकड़ लिया जाय तो इनको बेचकर निर्वाह करने के लिए कुछ धन कमाया जा सकता है। ऐसा विचार कर उन्होंने अपने पहनने का वस्त्र खोलकर पक्षियों पर फेंका। पक्षी वह वस्त्र लेकर उड़ गये। अब राजा नल के पास तन ढकने के लिए भी कोई वस्त्र न रह गया। नल अपनी अपेक्षा दमयन्ती के दुःख से अधिक व्याकुल थे। एक दिन दोनों जंगल में एक वृक्ष के नीचे एक ही वस्त्र से तन छिपाये पड़े थे। दमयन्ती को थकावट के कारण नींद आ गयी। राजा नल ने सोचा, दमयन्ती को मेरे कारण बड़ा दुःख सहन करना पड़ रहा है। यदि मैं इसे इसी अवस्था में यहीं छोड़कर चल दूँ तो यह किसी तरह अपने पिता के पास पहुँच जायेगी।

यह विचार कर उन्होंने तलवार से दमयन्ती की आधी साड़ी को काट लिया और उसी से अपना तन ढक कर तथा दमयन्ती को उसी अवस्था में छोड़ कर वे चल दिये। जब दमयन्ती की नींद टूटी तो अपने को अकेला पाकर करुण विलाप करने लगी। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह अचानक अजगर के पास चली गयी और अजगर उसे निगलने लगा। दमयन्ती की चीख सुनकर एक शिकारी ने उसे अजगर का ग्रास होने से बचाया। किंतु शिकारी स्वभाव से दुष्ट था। उसने दमयन्ती के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर उसे अपनी काम-पिपासा का शिकार बनाना चाहा। दमयन्ती उसे शाप देते हुए बोली - यदि मैंने अपने पति राजा नल को छोड़कर किसी अन्य पुरुष का चिन्तन किया हो तो इस पापी शिकारी के जीवन का अभी अन्त हो जाय। दमयन्ती की बात पूरी होते ही व्याध के प्राण-पखेरू उड़ गये। दैवयोग से भटकते हुए दमयन्ती एक दिन अपने पिता के पास पहुँच गयी। अंततः दमयन्ती के सतीत्व के प्रभाव से एक दिन महाराज नल के दुःखो का भी अन्त हुआ। दोनों का पुनर्मिलन हुआ और राजा नल को उनका राज्य भी वापस मिल गया।

गांव के पश्चिमी छोर पर पर्वतीय अंचल के सुंदर सीढ़ी नुमा खेतां के मध्य में अवस्थित दमयंती मंदिर पौराणिक पृष्ठभमि के साथ-साथ इसकी विशिष्ट वास्तुकला की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। मंदिर की तल छंद योजना में वर्गाकार गर्भगृह तथा अंतराल का प्राविधान है। ऊर्ध्वछंद योजना में वेदीबन्ध त्रिरथ जंघाभाग निर्मित है। जंघाभाग के अग्रभाग पर एक-एक रथिका निर्मित है। जंघाभाग के शीर्ष को एक चन्द्रशाला पट्टी से सज्जित किया गया है। जंघा और शिखर के मध्य एक सादे अंतरपट्ट का निर्माण किया गया है। नागर शैली के त्रिरथ रेखा शिखर के कर्णभाग पांच-पांच भूमि आमलकां से शोभित हैं। शिखर शीर्ष पर अमाल सारिका स्थापित है। अंतराल के ऊपर निर्मित सादी शकुनासिका है। शिल्प विनिमार्ण शैली के अनुसार यह मंदिर १०वीं-११वीं सदी में निर्मित माना जा सकता है। 

नाला चट्टी मंदिर समूह एवं स्तूप

रुद्रप्रयाग - केदारनाथ यात्रा मार्ग पर गुप्तकाशी से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर सड़क किनारे स्थित नाला गांव के मध्य यह मंदिर समूह एवं स्तूप अवस्थित है। यह मंदिर समूह एवं स्तूप, धार्मिक, आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है। यहां आठ प्राचीन मंदिर तथा एक स्तूप अवस्थित है।

स्कंदपुराण के अनुसार पूर्वकाल में राजा नल व दमयंती ने इस स्थान पर तपस्या की थी। राजा नल एवं दमयंती का प्रसंग महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महापुराण महाभारत के तृतीय अध्याय वनपर्व के उपपर्व नलोपाख्यान के अंतर्गत किया गया है। जब धर्मराज युधिष्ठिर अपना राजपाट हारकर वन में प्रवास कर रहे थे। तो एक दिन ऋषि बृहदश्व उनके पास सहानुभूति प्रकट करने आते हैं। युधिष्ठिर ऋषि का आदर सत्कार करने के उपरांत ऋषि से कहते हैं कि आप बड़े दयालु हैं जो इस दीन- हीन स्थिति में भी मेरे पास आये। अन्यथा मुझे तो लगता है कि मैं आज तक का इस संसार में जन्मा सबसे अभागा प्राणी हूँ। ऋषि बृहदश्व उत्तर देते हैं- ‘विपत्ति का आना कोई नई बात नहीं’ लोग कठिनाइयों के आते ही ऐसा सोचने लगते हैं कि वे इस संसार में सबसे अधिक दुखी हैं। फिर ऋषि बृहदश्व युधिष्ठिर को राजा नल एवं रानी दमयंती की कथा विस्तार से सुनाते हैं जिन्होंने एक समय पर विपरीत परिस्तिथियों का सामना किया परन्तु अंत में पुन अपना वैभव प्राप्त किया। इस प्रकार नाला का सम्बन्ध राजा नल एवं रानी दमयंती से जोड़ती अनेक पौराणिक कथाओं व जनश्रुतियों से आभास होता है कि हिमालय की शस्य श्यामला धरा को ऋषि मुनियों एवं साधू संतो ने ही नहीं वरन राजा - महाराजाओं ने भी अपनी तपस्थली के रूप में चुना है और संभवतः यही कारण है कि इस भूमि में कई अद्भुत एवं उत्कृष्ठ देवालयों का निर्माण हुआ।

इसी श्रेणी में सम्मलित नालागांव का मंदिर समूह भी उत्कृष्ट शिल्पशैली में निर्मित, ऐतिहासिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण स्थान है। मंदिर समूह में मुख्य मंदिर त्रिपुरा सुंदरी माँ ललिता देवी का है। मान्यता है कि राजा नल उसकी आराधना करते थे। निर्माण शिल्प की दृष्टि से, इस मंदिर की तल छंद योजना में गर्भगृह, अंतराल एवं सभामंडप बनाये गए हैं। मंदिर का वेदीबन्ध खुर, कुम्भ और कलश से सुसज्जित है। इसके ऊपर त्रिरथ जंघाभाग निर्मित है। जंघाभाग के अग्रभाग में एक रथिका बनाई गई है। मंदिर का त्रिरथ रेखाशिखर नागरशैली के अनुरूप निर्मित है। शिखरशीर्ष पर कलश, बिजौरा, आमलसारिका तथा छत्रावली से सुशोभित है। मुख्य मंदिर के पीछे नागरशैली के अनुरूप दो मंदिर तथा शिवालय के साथ एक अन्य मंदिर है। इन मंदिर समूहों का निमार्णकाल ११वीं-१२वीं सदी का है।

मुख्य मंदिर के परिसर में एक स्तूप अवस्थित है। स्थानीय लोग इस स्तूप को राजा नल की समाधि बताते हैं जबकि निवेदिता एवं राहुल सांकृत्यायन इस स्तूप को बौद्ध स्तूप मानते हैं जो कि बौद्धधर्म की इस क्षेत्र में उपस्थिति को इंगित करता है। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार इस स्थान पर पुराने शिवालय के बाहर एक बौद्ध पाषाण स्तूप है। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘हिमालय परिचय’ भाग १ में नाला का उल्लेख करते हुए यह भी कहा है कि कोने वाले मंदिर के दरवाजे के ऊपर तीन पक्तियों का एक कत्यूरीकालीन शिलालेख है। जो १२४६ई0 का लिखा हुआ है। वे आगे लिखते हैं कि इस मन्दिर के भीतर कई खंडित मूर्तियां हैं। शिव-पार्वती, लक्ष्मी-नारायण के अतिरिक्त एक जटाधारी मूर्ति किसी शैव संत की है। निवेदिता ने भी अपनी पुस्तक ‘फुट फॉल्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री’ में नाला को धार्मिक एवं ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान माना है।

भारतवर्ष में ही नहीं अपितु विश्वभर से अनेक अन्य विद्वानों ने भी नारायण कोटी, दमयन्ति मंदिर तथा नालाचट्टी के नाम से प्रसिद्ध इन स्थानों के विषय में लिखा है तथा यहाँ स्थित इन मंदिर समूहों का विशेष वर्णन किया है। जो इनके धार्मिक, आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व को तो दर्शाता है, साथ ही वास्तु एवं शिल्प की दृष्टि से महत्वपूर्ण इन मंदिरों पर शोध की अनेक संभावनाओं को भी उजागर करता है। इसीलिए वर्तमान में इन मंदिर समूहों को अनमोल धरोहर मानते हुए इन्हें संरक्षित करने के उद्देश्य से पुरातत्व विभाग ने अपने अधीन लिया है। 

संरक्षण के साथ ही यदि इन मंदिरों की कला, शिल्प व पुरातत्व को विश्व मानस के बीच प्रसारित किया जाए तो यह धरोहरें श्रद्धालुओं व पर्यटकों के साथ ही शोधार्थियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में विकसित होंगी।







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