by - praveen bhatt

02 Aug 2019


राष्ट्रीय

 प्रवीन कुमार भट्ट।उत्तराखंड, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध पर्वतीय प्रदेश है। सीमांत जनजातीय क्षेत्र से लेकर तराई भावर तक फैले उत्तराखंड राज्य की समृद्ध संस्कृति की पूरी दुनिया में पहचान है। भौगोलिक दृष्टि से पुराणों में हिमालय को पाँच खण्डों नेपाल खण्ड, कूर्मांचल खण्ड, केदारखण्ड, जलंधर व कश्मीर खण्ड में विभाजित किया गया है। उत्तराखंड का गढ़वाल हिमालय वह श्रेष्ठतम क्षेत्र है जिसे प्रकृति ने अपार वैभव प्रदान किया है। यहाँ के अप्रतिम सौन्दर्य से मण्डित हिमशिखर, विराट पर्वतों की श्रृंखला, सुन्दर वन उपवन, कल-कल, छल-छल करती सुन्दर नदियां, स्वच्छ जलधाराओं की अद्भुत शोभा, कानों में रस घोलता प्रकृति का सुन्दर संगीत, उपत्यकाओं में फैली फूलों की घाटियाँ, हरे-भरे मखमली बुग्याल, मंदिरों के घंटा निनादित स्वर सब कुछ एक ही क्षेत्र में अद्भुत दृश्य उपस्थित करते हैं। प्रकृति के उदार सानिध्य में केदारखण्ड क्षेत्र भक्ति व आध्यात्म का पर्याय है। इसी हिमालय और उसकी तलहटियों में निवास करती है उत्तराखंड की भोटिया जनजाति। भोटिया एक जीवट मानव समुदाय है। इन्होंने हिमालय की भीषणतम परिस्थितियों में न केवल अपने अस्तित्व को बनाए रखा बल्कि अपने गौरवमयी अतीत की सांस्कृतिक धरोहर को भी संरक्षित किया। भोटिया समुदाय की जीवटता का ही प्रतिफल है कि आज यह लोग समृद्ध हैं। उत्तराखंड में भोटिया रं, शौका, जाड़, तोल्छा और मारछा के नाम से जाने जाते हैं। जिनमें से तोल्छा और मारछा भोटिया चमोली जनपद में निवास करते हैं। उत्तराखंड की किसी अन्य जनजाति में इतनी आन्तरिक विविधता व भौगोलिक विस्तार नहीं पाया जाता है। अपने विराट स्वरूप एवं ऊँचाई के कारण हिमालय को भारतवर्ष का ताज कहा जाता है तो इसके मूल निवासी भोटिया समुदाय को भारत की आदिमजातियों का सरताज कहा जा सकता है। भोटिया जनजाति उत्तराखंड में ही नहीं अपितु भारत की जनजातियों में सर्वाधिक विकसित है। मानवशास्त्रियों के अनुसार भाषायी रूप से भोटिया समुदाय तिब्बतियों के अधिक करीब है और शारीरिक गठन के लिहाज से यह मंगोलाइट के निकट हैं। गढ़वाल और कुमांऊ के अन्य वाशिन्दों की तरह ही भोटिया समुदाय में भी राजपूतों जैसी रावत, राणा, कुंवर और चौहान उपजातियां विद्यमान हैं। जनपद चमोली के उत्तर पूर्व में निवास करने वाली भोटिया जनजाति का संबंध प्राचीन किरात जाति से माना गया है। मैनाक पर्वत पर बसे माणा व क्रौंचरन्ध्र पर बसे नीती के आसपास की घाटियों में ग्रीष्मकालीन व निचले स्थानों में नदी के बगड़ों में शीतकालीन प्रवास करने वाले यहां के भोटिया लोग स्वयं को रंग्पा कहलाना पसंद करते हैं। गढ़वाल में इस जनजाति के दो वर्ग तोलछा व मारछा नाम से जाने जाते हैं। ऋषि गंगा, धौली गंगा, विष्णु गंगा जैसी पावन नदियों, हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं व उनसे निकली मनोहारी जलधाराओं के निकट बसने वाली यह जनजाति एवं जनजातीय क्षेत्र अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस पावन क्षेत्र में नर-नारायण की तपोभूमि, अलकापुरी, सतोपन्थ, स्वर्गारोहिणी, शंकराचार्य का ज्योतिर्मठ, संजीवनी बूटी से युक्त द्रोणागिरी पर्वत, पंचबद्री, पंचकेदार, पंचप्रयाग की भूमि ने इन लोगों में भी नैसर्गिक सौन्दर्य व धार्मिक भावना को नवप्राण दिए हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह क्षेत्र हूंणों से युद्ध, गोरख्याणीं, भारत-तिब्बत व्यापार, चीन से संबंध व आक्रमणों के कारण राजनीतिक उथल-पुथल का क्षेत्र भी रहा है लेकिन भोटिया जनजाति की देशभक्ति व पराक्रम से इस देवभूमि की समृद्धि व सम्मान में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। चमोली जनपद में मारछाओं के मूल गांव माणा, गमसाली, नीती और बाम्पा हैं जबकि तोल्छाओं के मूल गांव कोसा, कैलाशपुर, फरकिया, मलारी, जेलम, फाक्ती, द्रोणागिरी, लाता, रेणी, सुराईठोठा और सुभांई आदि हैं। सुबाई, मल्लगांव और सूकी जैसे कुछ गांवों में दोनों जातियों की मिश्रित आबादी निवास करती है। अंग्रेज विद्वान एच.जी. वाल्टन की पुस्तक गढ़वाल गजेटियर के अनुसार भोटिया स्वयं को हिन्दू राजपूत मानते हैं। बैकुण्ठ धाम के नाम से पुकारे जाने वाले सर्वोच्च हिन्दू तीर्थ बद्रीनाथ के कपाट जब शीतकाल के लिए बंद होते हैं तब भगवान विष्णु की पद्मासन वाली पाषाण प्रतिमा को छह माह के लिए माणा गांव की कुंवारी मारछा कन्याओं द्वारा बुनी गई कम्बल में लपेट कर गर्भगृह में रखा जाता है। माणा के भोटिया समुदाय घण्टाकर्ण ईष्ट देवता ही हिन्दू धर्मावलम्बियों द्वारा बद्रीनाथ का अंगरक्षक माना जाता है। हिमालयन गजेटियर में एटकिंसन ने कहा है कि भोटिया शब्द की उत्पत्ति भोट शब्द से हुई है जोकि बोड शब्द का अपभं्रश है। इसका अर्थ तिब्बत से लगाया जाता है और इसी भोट शब्द ने भोटिया शब्द को जन्म दिया। भोटिया समाज पितृ सत्तात्मक समाज है। इनके परिवार व समाज में पिता या परिवार का बुर्जुग व्यक्ति ही संरक्षक माना जाता है। भोटिया जनजाति में दो वर्ण सवर्ण व अवर्ण मौजूद हैं।परिवार में बयोबृद्ध महिलाओं का महत्वपूर्ण स्थान है। वृद्ध पुरुष व महिलाओं को उनकी टोलियों में विशेष स्थान व आसन दिया जाता है। पुरुष वर्ग कृषि, पशुपालन व व्यापार का काम संभालते हैं जबकि महिलाएं कृषि, भोजन व ऊनी उद्योग को संभालती हैं। भोटिया समाज में जन्मोत्सव, सोलापाणी अर्थात नामकरण संस्कार, अन्नप्रासन, कर्णभेदन, जवांण (मुण्डन), कमरताण, विवाह संस्कार, सैदा पिठाई, दिन पट्टा, वस्त्र व्यूंतण, दण पुजै, मंगल स्नान, बट्टा सामंव, कयषु बानण, पैंता, कल्यार, विदाई आदि शुभकार्यां से जुड़े संस्कार नियमपूर्वक किए जाते हैं। जिस प्रकार शुभकार्यां से जुड़े संस्कारों का पालन भोटिया लोग नियमपूर्वक करते हैं उसी प्रकार मृत्यु से जुड़े कुछ संस्कार भी यहां प्रचलित हैं। जिनमें मरण छाको, सुल्टा, श्राद्ध आदि संस्कार व प्रथाएं प्रमुख हैं। भोटिया वास्तव में घुमन्तु और व्यापारिक मानव समूह रहा है। भारत और तिब्बत के बीच व्यापार करते हुए उन्होंने एक विलक्षण सांकेतिक भाषा का भी विकास किया। जिसे केवल दोनों क्षेत्रों के व्यापारी ही समझते थे। यह कहा जाता है भारत के भोटिया समुदाय और तिब्बतियों के बीच व्यापार संकेतों और इशारों से भी होता था। यह परम्परा थी कि व्यापारी अपने सामान तो दोनों हाथों से ढक लेता था और खरीददार से तब तक पैसा लेता रहता था जब तककि उसे वांछित दाम न मिल जाए। तिब्बत में लगातार हमला करने वाले हुणदेशी लुटेरों से बचने के लिए भी इस समुदाय ने एक अनूठी बोली का विकास किया जिसे चमोली में रांग्पा या मार्छा बोली कहा जाता है। अन्य भोटिया समुदायों की बोलियों की तरह ही मारछा और तोल्छा बोलियों में भी काफी भिन्नता है। तोल्छा बोली गढ़वाली भाषा से मिलती है जबकि मारछा बोली को समझना आसान नहीं है। भोटिया अन्य जनजातियों की भांति वन व कृषि पर आधारित समुदाय नहीं रहा है। व्यापार ही इस समुदाय का मुख्य व्यवसाय था। 1962 के भारत-चीन युद्ध से पूर्व नीती घाटी के व्यापारी बाड़ाहोती से होकर तिब्बती मंडी दाबा पहुंचते थे तथा माणा के व्यापारी थोलिंग मंडी से व्यापार करते थे। चीन युद्ध के बाद यह व्यापार पूरी तरह से बंद हो गया है। भोटिया समुदाय तिब्बत से भेड़-बकरी, घोड़े, हुण्डेरे, च्यालपू, चंवर पूंछ, पसमीना, तिब्बती कालीन, चमड़ा, सुहागा, रांगा, तिब्बती नमक, मूंगा, हींग, लालजड़ी, जहरमोरा, और वनककड़ी आदि का व्यापार करता था। ऊनी वस्त्रों में थुलमा, गुदमा, दन्न, चौपट्टा, पट्टू, लावा, आंगड़ा, कालीन, पंखी एवं शटन तथा रांछ पर ऊनी वस्त्र बुनना भी उन्होंने तिब्बत से ही सीखा था। इतिहासकार बांधायन का कहना है कि तिब्बत से कई बहुमूल्य वस्तुओं, धातुओं तथा वनौषधियों का व्यापार होता था। इनका व्यापारिक क्षेत्र कोलकाता, मद्रास, जावा, सुमात्रा, सिंगापुर, चम्पादेश, दक्षिणी समुद्र तथा सात समुद्र पार तक था। तिब्बत में रामुरा, ल्हासा और दाबा जैसे स्थान माणा तथा नीती के व्यापारियों की व्यापारिक मंडियां बन चुकी थीं। भोटिया और हुणियां व्यापारियों की मित्रता सरछू-मालछू कहलाती थी। व्यापारियों के बीच मित्रता और व्यापारिक संबंध पीढ़ी दर पीढ़ी चलते थे। सरछू-मालछू प्रथा के तहत दोनों समुदायों के व्यापारी एक दूसरे की जूठी शराब पीते थे। मित्रता को कपट से परे रखने के लिए साक्षी प्रमाण के तौर पर देवमूर्ति या धार्मिक पुस्तकें सिर पर रखी जाती थीं। इसे कूड़ाखार प्रथा कहते थे। इसके साथ जो प्रतिज्ञा ली जाती थी जिसे डालीम-डाठीम कहते थे। स्वेच्छा से यह मित्रता बंधन तोड़ा भी जा सकता था।  चमोली जनपद के तोल्छा और मारछा भोटियाओं में साल में दो बार निवास परिवर्तन की परम्परा रही है। भोटिया जनजाति के खान-पान, रहन-सहन और जीवनशैली पर जलवायु का गहरा प्रभाव रहा है। उच्च हिमालयी भूगोल और पर्यावरण का उनकी शारीरिक बनावट पर भी प्रभाव पड़ा है। जिस क्षेत्र में भोटिया रहते हैं उसका एक चौथाई भाग छह महीने बर्फ से ढका रहता है। यहां मई से अक्टूबर तक मानसून की मामूली वर्षा होती है बाकी हिस्सा सूखा रहता है। जिसे शुष्क मरूस्थल भी कहा जाता है। सीमांत क्षेत्र के ऊंचाई वाले हिस्सों में तापमान भी घटता जाता है। हवा अधिक चलने के कारण गर्मियों में तापमान अधिक घट जाता है। इसलिए इस ठण्डे इलाके में धूप या आग का बहुत महत्व होता है हालांकि अब वैश्विक जलवायु परिवर्तन का प्रभाव इस क्षेत्र पर भी पड़ रहा है। भोटिया समुदाय के गांव छोटे और दूर-दूर होते हैं। ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में बड़े गांवों के लायक पर्याप्त धूप व तेज हवा से मुक्त जगह नहीं मिल पाती है। खेती और धूप के लिए पहाड़ों की दक्षिणी ढलानों को बसासत के लिए चुना जाता है। खेतों के लिए ऐसे स्थानों का चुनाव किया जाता था जहां देर तक धूप रह सके और बर्फ भी जल्दी पिघल जाए। भोटिया समुदाय के घर प्रायः दो-चार के हिसाब से पंक्तियों में होते हैं। गांव की संरचना बहुत ही साधारण होती है तथा घरों में जाने के लिए बहुत ही तंग रास्ते होते हैं। यह इसलिए ताकि घरों के अंदर बर्फानी हवाओं का असर कम हो। इनके नीचे गर्म घाटियों में सर्दियों की बस्तियां भी ऊपर के जैसी ही होती हैं। हालांकि अब गांवों में सड़कें पहुंच जाने के कारण भोटिया समुदाय के लोग बस्तियों से अलग सड़कों के किनारे दूर-दूर घर बनाकर भी रहने लगे हैं। भोटिया समुदाय के घर भी सांस्कृतिक धरोहर एवं सामाजिक एकता का प्रतिबिम्बन करते हैं। इनकी भवन निर्माण शैली पर जलवायु का गहरा असर है। ठंड एवं बर्फ को रोकने के लिए मोटी दीवारें, छोटे तथा कम ऊंचाई वाले कमरे छोटी खिड़कियां भोटिया भवन शैली की पहचान है। भारी हिमपात से बचने के लिए घरों की छतें शंक्वाकार बनाई जाती हैं लेकिन धीरे-धीरे अब यह अवधारणा बदल गई है। शीतकालीन बसासतों वाले सभी गांवों में अब बड़े आलीशान व पक्के मकान बन गए हैं।  उच्च हिमालयी मौसम और तापमान के हिसाब से ही भोटिया समुदाय के वस्त्र भी भिन्न होते हैं। भोटिया जनजाति द्वारा उपयोग किए जाने वाले अधिकांश वस्त्रों का रंग काला या सफेद होता है। यह ऊनी या सूती वस्त्रों का ही मुख्यतः प्रयोग करते हैं। भारत-तिब्बत सीमा के निवासी भोटिया अपने उत्सव व त्यौहारों को बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं। सीमान्त क्षेत्र में रहने व शताब्दियों तक तिब्बत के साथ व्यापार करने के कारण भोटिया समुदाय पर तिब्बत की परम्पराओं का प्रभाव है। हिन्दु धर्म के देवी-देवताओं के साथ ही भोटिया लोग तिब्बती देवता ‘फैला’ की पूजा भी करते हैं। भोटिया लोग पंचनाग, भूमियाल, क्षेत्रपाल, फैला, पितृ देवताओं के साथ-साथ शिव, नन्दा के रूप में पार्वती, कृष्ण, विष्णु की भी मुख्य रूप से पूजा करते हैं। हिन्दू पर्व और त्यौहारों को भी भोटिया लोग उसी प्रकार मनाते हैं जिस प्रकार पूरा देश मनाता है। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, रक्षाबंधन, होली, दशहरा, दीपावली, धनतेरस, भैंल्लो, मकर संक्रांति, घ्यू सगरानी, बसन्त पंचमी, बिखोती व श्राद्ध के पर्व व त्यौहार धूमधाम से मनाए जाते हैं। नीती घाटी के तोलछा समुदाय द्वारा नन्दाष्टमी, लास्पा, मलारी की मानौ पूजा, अषाढ़ संक्रांति, रगोसा, बिखोती, गरपग की पूजा व सीता की पूजा का सितूण उत्सव प्रमुख रूप से मनाए जाते हैं। मारछा समुदाय द्वारा प्रमुख रूप से जन्माष्टमी का मेला, घण्टाकर्ण की पूजा, माता मूर्ति का मेला, बदरीनाथ को घृत कमली अर्पण करने के उत्सव के साथ ही लौंण-तिलौंण, बैरी तोको, नव्वाँ त्यौहार, लास्पा तथा गमशाली का 15 अगस्त प्रमुख रूप से मनाए जाते हैं। इन पर्वां के अलावा मारछा और तोल्छा समुदाय द्वारा गोचर मेला, नन्दा अष्टमी की देवा नन्दा द्योरा तथा कलेवा उत्सव आदि का सामुहिक रूप से आयोजन किया जाता है। लाता, जेलम और मलारी गांवों में भादो माह की अष्टमी को हर साल नंदा अष्टमी का त्यौहार मनाया जाता है। लाता की प्रसिद्ध नन्दा देवी को पार्वती का रूप मानते हैं। लास्पा की प्रसिद्ध पूजा मलारी और जेलम गांवों में प्रतिवर्ष आयोजित की जाती है। मलारी गांव में तीन परिवारों को इस वर्ष पूजा का अवसर मिलता है उस परिवार को बारी कहा जाता है। पूजा के दौरान दाणा देवताओं को विशेष प्रकार के तिब्बतीय व्यंजन थुपका का भोग लगाया जाता है। लास्पा के दौरान ही मलारी गांव में मानौ राक्षस से जुड़ी पूजा भी की जाती है। प्राचीन मान्यता के अनुसार मलारी गांव में मानौ राक्षस रहता था उसका यह नाम मानव भक्षण के कारण पड़ा था। लाक्षागृह से बच निकलने के बाद हिमालयी क्षेत्र में पहचान छिपाकर विचरण कर रहे पांडवों को जब इस राक्षस के विषय में पता चला तो उन्होंने गांव के लोगों की रक्षा का वचन लिया। महाबलशाली भीम ने मल्ल युद्ध करते हुए उस राक्षस का अंत कर दिया। मरते समय उस राक्षस ने मल्लहारी-मल्लहारी कहा जिसका अर्थ हैं मैं मल्ल युद्ध हार गया। मल्लहारी के अपभं्रश से ही मलारी गांव का नामकरण हुआ है। पूजा का समापन गांव के सामने के पहाड़ बांगा पर रक्षक देवता बांग्चा राणा की पूजा के साथ होता है। तोलछा भोटिया आषाढ़ की समाप्ति पर आषाढ़ सक्रांति का त्यौहार बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन गांव के लोग मुख्य रूप से फाफर की सब्जी फफरिया का प्रयोग करते हैं। गांव में अधिक नमीयुक्त खेत सेम में म्योऊं/मेहल वृक्ष की फलदार टहनी को गाड़ा जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से फसल अच्छी होती है। मलारी में सेम नामक स्थान पर सायंकाल को राम-लक्ष्मण, वानर सेना एवं राक्षसों के बीच युद्ध का मंचन किया जाता है। पूर्व में इस असवर पर कांस द्योरा देव यात्रा की परम्परा भी थी जो अब धीरे-धीरे समाप्त हो गई है।विषुवत संक्रांति अर्थात बिखोदी का त्यौहार भी भोटिया समुदाय द्वारा धूमधाम से मनाया जाता है। बैशाख महीने के प्रथम तिथि के दिन मनाए जाने वाले बिखोदी के त्यौहार में लाता, तपोवन आदि स्थानों पर मुखौटा नृत्य का आयोजन किया जाता है। तीन दिनों तक चलने वाले इस पर्व में लाता गांव के लोग अपने संबंधियों को भी आमंत्रित करते हैं। नन्दा देवी के मंदिर में पूजा अर्चना के साथ ही उनके भ्राता लाटू देवता का पूजन भी किया जाता है। तोलछा समुदाय में नागपूजा करने की प्राचीन परम्परा भी है। कहा जाता है कि गिरथी गंगा को पार करके जब नाग देवता ने इस स्थान में आगमन किया व इस क्षेत्र के रक्षक क्षेत्रपाल के रूप में स्थापित हुए। इसी कारण इस गांव का नाम गर अर्थात विष तथा पग अर्थात पैर मिलाकर गरपग पड़ा। गरपग गांव में हर वर्ष क्षेत्रपाल के रूप में नाग की पूजा की जाती है। सितूण अर्थात सीता के रूप की पूजा का महापर्व हर बारह वर्ष के बाद सेंगला गांव जेलम में मनाया जाता है। इस पर्व में मेले जैसा माहौल होता है। इस उत्सव में शामिल होने के लिए गांव के सभी लोग दूर-दूर से पहुंचते हैं। गांव में रहने वाले सभी परिवार अपने सगे-संबंधियों विशेष रूप से ध्याँणियों को बुलाकर उनकी सेवा सत्कार करते हैं। इस पर्व में पार्वती माता की सीता रूप में पूजा की जाती है। मारछा समुदाय में भी अनेक पारम्परिक त्यौहार रीति रिवाज के साथ मनाए जाते हैं। लौंण-तिलौंण का त्यौहार नीती घाटी के गमशाली गांव में प्रतिवर्ष जेठ माह के दूसरे मंगलवार को मनाया जाता है। बैरी तोको मारछा समुदाय द्वारा मनाया जाने वाले एक दूसरा प्रमुख त्यौहार है। बैरी तोको का अर्थ है दुश्मन पर निशाना साधना। यह त्यौहार प्रतिवर्ष श्रावण मास की संक्रांति को गोरखाओं के आक्रमण से सुरक्षा के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस त्यौहार में लकड़ी के एक विशेष पात्र में पीली हल्दी घोलकर बनाया गया टीका सर्वप्रथम इष्टदेव फैला को लगाया जाता है। भादों में नई फसल पैदा होने के अवसर पर नव्वां त्यौहार मनाया जाता है। गांव के सभी लोग नई फसल निकालकर घर पर लाते हैं। अपने इष्ट देवता को वह फसल चढ़ाकर फिर घर के भण्डार पात्र से पुराना अनाज हटाकर नया अनाज रखा जाता है। लांग पर ईष्ट देव फैला की चांदी की मूर्ति लगाकर उस पर नया पीला रेशमी वस्त्र साढ़ा चढ़ाया जाता है। देवता को खेतों में घुमाया जाता है तथा हर परिवार के खेतों से थोड़ा नया अनाज निकालकर देवता पर चढ़ाया जाता है। इस अवसर पर महिलाएं मांगल गीत भी गाती हैं। आश्विन अर्थात असोज माह के तीसरे मंगलवार को लास्पा त्यौहार मनाया जाता है। लास्पा एक तिब्बती शब्द है जिसका अर्थ है ईष्ट देवता की पूजा। इस त्यौहार में गणज्या अर्थात गीत गाने वाले ही प्रमुख होते हैं। कुंवर जाति का एक पुरुष तथा एक महिला ही प्रधान गायक-गायिका होते हैं। इस त्यौहार में ईष्ट देव की पूजा कर मांगल गीत गाए जाते हैं। पूजा में जान तथा सिल्दू का भोग लगाया जाता है। गणज्या-गणज्याणी द्वारा पूजा करके भोग लगाने के बाद ईष्ट देव का गुणगान किया जाता है। यह पूजा पूरी तरह से तिब्बती रंग में रंगी होती है। इस पूजा में जब देवता को अपने घर में आमंत्रित किया जाता है तो कहते हैं - स्यौ नंगला अर्थात घर के अन्दर पधारिये। इसके साथ ही पंचनाग, पांडवों व नन्दा देवी की पूजा भी की जाती है। यह चमोली जिले के एकमात्र सीमान्त क्षेत्र है जहां मंगलवार को जो भी त्यौहार पड़ता है उसमें बकरे की बलि दी जाती है तथा मांसाहार ग्रहण किया जाता है। मांसाहारी व्यंजन थुकपा बनाकर प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाता है। नीती घाटी के गमशाली में सदियों से सर्वजन हिताय के उद्देश्य से महायज्ञ करने की परम्परा भी रही है। ईष्ट देवता के पूजा स्थल खलकत्ती में यह आयोजन किया जाता है। पारम्परिक वाद्य यंत्र ढोल-दमाऊ, भ्वांकर आदि बजाये जाते हैं। महिलाएं मांगल गीत गाती हैं। दो- तीन दिन तक चलने वाले आयोजन के दूसरे दिन विशाल यज्ञ का भी आयोजित किया जाता है। कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भी मारछा समुदाय द्वारा एक बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर माणा घाटी में मेला लगता है। माता मूर्ति का मेला मारछा समुदाय का एक अन्य बहुत बड़ा उत्सव है। कार्तिक महीने में माणा गांव में चार बारी तय किए जाने के बाद यही लोग विधिवत रूप से घण्टाकर्ण, बद्रीनाथ व माता मूर्ति की पूजा से जुड़े कार्य करते हैं। वावन द्वादशी को भगवान बदरीनाथ, उत्सव रूप में माता मूर्ति की पूजा के लिए पण्डितों के साथ माणा में माता मूर्ति मंदिर में आते हैं। कुछ यात्री भी इस यात्रा का हिस्सा बनते हैं। माता मूर्ति के लिए सारा अनाज, चढ़ावा व प्रसाद बदरीनाथ से ही आता है माणा गांव के लोगों को केवल पूजा के लिए लकड़ी व वर्तनों की व्यवस्था करनी होती है। अन्य पर्वां एवं उत्सवों के साथ ही नीती घाटी में स्वतंत्रता दिवस भी लोकपर्व के रूप में मनाया जाता है। चार गांवों फरकिया, बम्पा, गमशाली और नीती के लोग स्वतंत्रता दिवस के पर्व को बड़े ही उत्साह से मनाते हैं।इन त्यौहारों व उत्सवों के अतिरिक्त कुछ ऐसे पर्व भी हैं जिन्हें तोलछा और मारछा सामुहिक रूप से मनाते हैं। ऐसा ही एक सामुहिक पर्व नन्दा द्यूरा भी है। यह बारह वर्षां में एक बार नन्दाष्टमी के अवसर पर आयोजित होने वाली देवयात्रा है। प्रत्येक बारह वर्ष बाद सितम्बर माह में शुभलग्न के अनुसार लाता में स्थित देवी के मंदिर पूजा कर स्थाली लाटू देवता का नियमबद्ध आह्वान किया जाता है। इसके बाद लाता गांव के पंडित व कुछ अन्य लोग नन्दा की डोली लेकर क्षेत्र के सभी गांवों में पैदल भ्रमण करते हैं। कुल मिलाकर यह यात्रा छब्बीस दिनों तक चलती है। इस महापर्व के लिए मारछा और तोलछा समान रूप से तैयारी करते हैं। गौचर का ऐतिहासिक मेला भी चमोली जनपद का एक सामुहिक उत्सव बन गया है। भोटिया समुदाय द्वारा तैयार किए गए लव्वा, पंखी, पट्टू, दन, चुटका, थुलमा, टोपी, मफलर, शॉल के साथ अन्य तिब्बती उत्पादों को पर्वतीय अंचलों के लोगों तक एक ही स्थान से पहुंचाने के लिए 1943 से यह मेला शुरू किया गया था। भोटिया समुदाय में बच्चों का भी एक उत्सव होता है जिसे कल्यौ मंगणी या अम्बे जाग का नाम दिया गया है। यह युवाओं और बच्चों का सामाजिक उत्सव है। इस उत्सव में सभी बच्चे अपने घरों से कच्चा अनाज एकत्र करते हैं और रात्रि में अनेक व्यंजन बनाकर मिल-बांटकर खाते हैं। इस प्रकार बेहद विपरीत व कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जीवन निर्वाह करने वाले भोटिया समाज का योगदान हमारे देश, प्रदेश व समाज के लिए भी कम नहीं हैं। विश्व प्रसिद्ध पर्यावरण संबंधी चिपको आन्दोलन की जननी गौरा देवी, बाली देवी का संबंध भी इसी समुदाय से रहा है। वर्तमान में यह समुदाय देश की सेवा में तत्पर होकर कार्य कर रहा है। सीमांत का असल प्रहरी यही समुदाय है।संदर्भ ग्रंथः-हिमालयन गजेटियर :- एटकिंशनगढ़वाल का गजेटियर :- एच. जी. वाल्टनभोटियाज ऑफ इण्डो तिब्बत बार्डर :- बी.बी. चटर्जीउत्तराखंड की जनजाति तोलछा-मारछा  :- डॉ. मीनाक्षी राणाउत्तराखंड जनजातियों का इतिहास :- जय सिंह रावत







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