by - Praveen Bhatt

21 Sep 2020


उत्तराखंड

प्रेम हिंदवाल : सीमान्त की जनजाति लोककलाओं के जाणगुरू

डॉ. नंद किशोर हटवाल

 

    वर्ष 1998, अगस्त माह। नीति घाटी के दुम्फूधार में स्वतन्त्रता दिवस समारोह। नीति, गमशाली, बाम्पा और फरकिया, सीमान्त के इन चार गांवों के बीच आयोजित लोकनृत्य प्रतियोगिता। फरकिया गांव द्वारा बगड्वाल नृत्य की प्रस्तुति और इस ग्राम स्तरीय प्रतियोगिता में प्रथम स्थान।

    वर्ष 2019, दिसम्बर माह। छत्तीसगढ़ में आयोजित राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव। उत्तराखण्ड का वही परम्परागत बगड्वाल नृत्य। और राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम स्थान।

        इन दोनो प्रस्तुतियों में एक बात साझा है और वो है इन प्रस्तुतियों के नृत्य निर्देशक और ढोल वादक प्रेम हिंदवाल।

    अपने गांव फरकिया में बगड्वाल-पौंणा नचाना हो या इनकी मंचीय प्रस्तुतियां देनी हो। लास्पा, सरों, छोलिया, मंडाण नचाना हो या शादी विवाह या अन्य किसी भी परम्परागत अवसरों पर ढोल बजाना हो प्रेम हिन्दवाल को इन सब पर महारत हासिल है। ढोल वादन में ही नहीं प्रेम हिन्दवाल पौंणा, बगड्वाल, पाण्डव, सारों, छोलिया, मंडाण आदि नृत्यों को बड़ी निपुणता, कलात्मकता और परम्परागत बारीकियों के साथ कर लेते हैं।    ‘‘मैंने गांव से लेकर विकासखण्ड, जिला, मण्डल, प्रदेश तथा राष्ट्रीय स्तर पर उत्तराखण्ड के लोकनृत्यों की मंचीय प्रस्तुतियां दी हैं तथा इन सभी स्तरों पर आयोजित विभन्न प्रतियोगिताओं/प्रदर्शनों में जीत हासिल की।’’ 1998 में अपने गांव के लिए प्रथम स्थान दिलाने को प्रेम अपने जीवन की बड़ी घटना बताते हैं। वे कहते हैं, ‘‘जब मेरे पिता का देहान्त हुआ मेरी उम्र 13 साल थी। मेरे पिता का नाम बेली हिंदवाल है और वे और मेरे दादा अपने जमाने के जाने-माने ढोल वादक थे। मेरे पिता और चाचा टीम लेकर जाते थे। मेरे पिताजी हारमोनियम भी बजाते थे। जोशीमठ में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी उन्होने प्रतिभाग किया और प्रथम स्थान प्राप्त किया। मैं अपनी किशोरावस्था से ही इस कार्य को करता चला आ रहा हूं पर 1998 में दुम्फूधार में आयोजित लोकनृत्य प्रतियोगिता में हमारा गांव प्रथम आया तो उस घटना के बाद मेरा आत्मविश्वास बढ़ा। 2002 मैंने भोटिया जनजाति कला मंच की स्थापना की और इसके माध्यम से काम करना शुरू किया। इस मंच के तहत हमारी टीम भारतवर्ष के अनेक राज्यों जैसे- पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, असम, उड़ीसा, कर्नाटक, मुंबई, गुजरात एवं झारखंड आदि राज्यों में उत्तराखण्ड की लोकनृत्यों की प्रस्तुति दे चुकी हैं। दिल्ली में कामलवैल्थ गेम, योग महोत्सव िऋषिकेश, विरासत, उत्तराखण्ड महोत्सव, गढ़वाल महोत्सव, राजभवन देहरादून सहित कई प्रतिष्ठित मंचों पर हम इस सीमान्त क्षेत्र के परम्परागत नृत्यों का सफलता पूर्वक प्रदर्शन कर चुके हैं।’’        प्रेम हिंदवाल की टीम का चयन अन्तर्राष्ट्रीय आदिवासी महोत्सव के लिए भी हुआ है। इसे इसी वर्ष 8 अपै्रल को जयपुर में होना था। लेकिन महामारी के कारण आयोजन रद्द हो गया। ‘‘लेकिन ये आगे होगा और हमारी टीम इस अन्तर्राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव में प्रथम स्थान प्राप्त करेगी ऐसी मुझे आशा है।’’ प्रेम हिंदवाल कहते हैं।     प्रेम हिंदवाल सिर्फ ढोल वादक और लोककलाओं के प्रस्तोता ही नहीं इन नृत्यों के कुशल निर्देशक और प्रशिक्षक भी हैं। भोटिया जनजाति की प्रस्तुतिपरक लोक कलाओं के क्षेत्र में प्रेम को विशेष महारत हासिल है। स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन कर प्रेम ने इन नृत्य विधाओं को नई पीढी के युवकों को सिखा रहे हैं। नृत्य प्रशिक्षक के रूप में प्रेम को कई अन्य संस्थाओं द्वारा भी आमन्त्रित किया जाता है।    इन्होंने ‘गुरु-शिष्य परंपरा योजना’ के अन्तर्गत ढोल कला के संरक्षण हेतु कार्य किया। वर्ष 2006-2007 में नॉर्थ जोन कल्चर सेंटर पटियाला द्वारा संचालित योजना में प्रेम हिंदवाल ने लगभग 15 से 20 नव युवकों को ढोल वादन का प्रशिक्षण दिया। वर्ष 2009-2010 में उत्तराखंड संस्कृति विभाग द्वारा ‘गुरु-शिष्य परंपरा योजना’ के तहत 20 नवयुवकों को ढोल दमाऊ का प्रशिक्षण भी दिया है। वर्ष 2013 में संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार द्वारा जूनियर फेलोशिप अवार्ड प्राप्त किया।  इसमें 2 वर्ष तक इनके द्वारा लोकवाद्य यंत्र पर अनुसंधान किया गया जिसकी रिपोर्ट भारत सरकार को सौंपी गई।     शादी के लग्नों के अवसर पर प्रेम के पास निमन्त्रणों के ढेर रहते हैं। सालभर पहले बुकिंग हो जाती है। ‘‘अपने गांव की शादियों में तो अनिवार्य रूप से शामिल होता हूं लेकिन समय मिलने पर ही दूसरी शादियों के लिए हाँ कहता हूं।’’ बताते हैं प्रेम हिंदवाल। जिन शादियों में ढोल वादक के रूप में प्रेम हिंदवाल हैं समझो वहां पौंणा नृत्य से समा बंध जाती है। नृत्य से अपने आप को रिटायर कर चुका पौंणा (बराती) भी दो फरकणी नाचे बिना नहीं रह सकता।    ‘‘मैंने इस कार्य के लिए एक टीम बना रखी है। इस काम में अच्छी-खासी आय हो जाती है। बैंड की तरह हमारी भी बुकिंग होती है।’’ सामाजिक अन्याय और भेदभाव के खिलाफ भी प्रेम संघर्ष करते है-‘‘शादी में जाने से पहले मैं साफ-साफ शर्तें रखता हूं कि हमारे साथ इज्जत का बर्ताव किया जाय। खाने-सोने का सही इंतजाम होना चाहिए। और इतना पैसा आपको देना पड़ेगा। छुवाछूत का मैं पुरजोर विरोध करता हूं।’’ प्रेम का कहना है कि पहले के मुकाबले यह कम हुआ है लेकिन समाप्त नहीं हुआ है। प्रेम हिंदवाल मानते हैं कि ढोल वादन से जब तक आय होती रहेगी ढोल बजता रहेगा। जितनी आजीविका चलेगी उतनी ही यह कला फलेगी-फूलेगी।    प्रेम हिंदवाल ने भोपाल मध्य प्रदेश में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय की प्रदर्शनियों के विकास और आयोजनो की सफलता में उल्लेखनीय योगदान दिया। इन्होने संग्रहालय की ‘मुक्ताकाश प्रदर्शन हिमालय ग्राम’ में भोटिया जनजाति के पारम्परिक आवास प्रकार के निर्माण में संग्रहालय को अपना उल्लेखनीय सहयोग प्रदान किया। इसके तहत इन्होने उत्तराखण्ड राज्य के सीमान्त विकासखण्ड जोशीमठ क्षेत्र में स्थित ग्राम मलारी के एक मकान का प्रारूप शिल्प बनवाया। जिसे देखने के लिए दूरदराज से हजारों लोग जाते हैं और यह पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी बना है। वर्ष 2013 में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने अपने स्थापना दिवस पर प्रेम हिंदवाल को सम्मानित भी किया।    प्रेम हिंदवाल बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। इन्होने नाटकों में अभिनय भी किया है। ‘जमन दास ढोली’ नाटक में प्रमुख किरदार के रूप में अपनी अभिनय की छाप छोड़ी है। कई लोकगीतों के डांस वीडियो में नर्तक के रूप में नृत्य भी किया है। प्रेम क्रिकेट के राष्ट्रीय एम्पायर भी हैं। इन्होने सन् 2009-10 में राष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल फेडरेशन उत्तर प्रदेश द्वारा बांग्लादेश में आयोजित मैत्री मैच में तथा उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान के क्रिकेट मैचों में अंपायरिंग की है।    श्री हिंदवाल विगत 10 वर्षों से केंद्रीय विद्यालय जोशीमठ, जनपद चमोली में बी.एम.सी. (विद्यालय मैनेजमेंट कमेटी) सदस्य के रूप में कार्य कर चुके हैं। प्रेम हिंदवाल स्वास्थ्य विभाग जोशीमठ, जनपद चमोली में विगत 10 वर्षों से स्वास्थ्य प्रबंधक कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में कार्य कर रहे हैं। विगत 25 वर्षों से नगर पालिका परिषद जोशीमठ में सामाजिक आयोजन समिति के सदस्य के रूप में भी आपना योगदान दे रहे हैं। 2013 में राज्य के केदारनाथ एवं बद्रीनाथ क्षेत्र में आई भीषण दैवी आपदा के दौरान इनके द्वारा राहत एवं बचाव कार्य में महत्वूर्ण योगदान दिया गया।    जनजाति की लोककलाओं के प्रति प्रेम हिंदवाल का समर्पण आशा जगाता है। गांवों में होने वाले पाण्डव एवं बगड्वाल नृत्यों में प्रेम हिन्दवाल ढोल वादक के रूप में प्रमुखता के साथ आमन्त्रित किये जाते हैं। सिर्फ ढोल वादन में ही नहीं गांवों में होने वाले इन नृत्यों के परम्परागत विधि विधान का भी प्रेम हिन्दवाल को गहन ज्ञान है। नृत्य की बारीकियों, इसके सम्पूर्ण ताल और छोपों को प्रेम भली प्रकार जानते हैं। इन नृत्योत्सवों के आयोजन के अन्य परम्परागत विधि-विधान तथा अनुष्ठानों की भी प्रेम को जानकारी है इसलिए प्रेम की भागीदारी सीमान्त गांवों में सिर्फ ढोल वादक के रूप में ही नहीं होती, बल्कि एक ‘जाणगुरू’ के रूप में इन आयोजनो में गांवों द्वारा सम्मानपूर्वक आमन्त्रित किये जाते हैं।    प्रेम हिंदवाल का मूल गांव फरकिया है। भारत की सीमा पर स्थित यह गांव ग्यारह हजार फुट की उचाई पर है। शीतकाल में बर्फ यह पूरा इलाका बर्फ से ढक जाता है तथा फरकिया गांव के लोग जोशीमठ, छिनका, थिरपाक और विजार गांवों प्रवर्जन करते हैं। वर्तमान में प्रेम सिंहधार, जोशीमठ में रहते हैं।        प्रेम हिंदवाल सिर्फ परम्परागत स्तर पर ही नहीं गत तीस वर्षों से सीमान्त क्षेत्र की इन लोककलाओं के संरक्षण और विकास में लगे हैं। इन्होंने सीमान्त क्षेत्रों में होने वाले लोगनृत्यों, लोकगीतों तथा लोकनाट्यों की बेहतरीन मंचीय प्रस्तुतियां तैयार की है। इनकी प्रस्तुतियां मूल के काफी निकट होती हैं। ‘‘मेरा प्रयास रहता है कि अपने लोकनृत्य बिना किसी मिलावट और घाल-मेल के मूल रूप में ही मंच पर दिखे। और इसमें मैं सफल हुआ हूं।’’ बताते हैं प्रेम हिंदवाल। वे देशभर के डेढ़ सौ से अधिक मंचों पर इस राज्य के सीमान्त क्षेत्र की जनजाति के लोकनृत्यों की प्रस्तुतियां दे चुके हैं।    लोक कलाओं के संरक्षण के लिए इनका आजीविका से जुड़ना महत्वपूर्ण है लेकिन फिलहाल ऐसा होना ‘तिमले के फूल’ की तरह है। सरकारी-गैर सरकारी और संस्थागत रूप से भी कोई मजबूत प्रयास नहीं दिख रहे हैं। वैयक्तिग रूप से कलाकारों द्वारा किये जाने वाले प्रयास ही आशा की किरण है। कलाकारों का जज्बा और ताकत बनी रहे इसके लिए अच्छा है कि इन्हें सहायता और सम्मान मिले। इस दृष्टि से प्रेम हिंदवाल किसी बड़ी सहायता और सम्मान के हकदार हैं।







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