by - Praveen Bhatt

26 May 2020


शिक्षा

देहरादून। लॉकडाउन काल में पाठकों और पुस्तकप्रेमियों को किताबों से जोड़ने की समय साक्ष्य की मुहिम रंग ला रही है। फेसबुक पर ‘समय साक्ष्य लाइव नाम से शुरू की गई यह सीरिज समय साक्ष्य के पेज पर रोज शाम को छह बजे शुरू होती है जिसमें प्रतिदिन एक नये लेखक के जीवन और उसके साहित्य से पाठकों को रूबरू कराया जाता है। इस मुहिम के तहत अब तक 40 लेखकों की 50 किताबों पर चर्चा हो चुकी है।अब तक विख्यात कथाकार विद्यासागर नौटियाल, मोहन थपलियाल, दिनेश कर्नाटक, शशिभूषण बडोनी, हेमचन्द्र सकलानी, सुशील उपाध्याय, प्रताप सिंह ‘मासाप’, अशोक कण्डवाल, महावीर रवांल्टा, मुकेश नौटियाल, अनिल कार्की, मनीषा अग्रवाल, गीता गैरोला, माया गोला, नूतन डिमरी गैरोला, कमल जोशी, लवराज, अमिता प्रकाश, हेम चन्द्र सकलानी, शंकर जोशी, मनीषा अग्रवाल, शेर सिंह पांगती, नन्दकिशोर हटवाल, चन्द्रशेखर तिवारी, देवी पांडे, प्रीतम अप्च्यांण, प्रभात उप्रेती, शमा खान, दीवा भट्ट, भगवान सिंह धामी, शांति प्रकाश ‘जिज्ञासु’ रेनू सिंह, तारा चन्द्र त्रिपाठी, तापस चक्रवर्ती, राजेश्वरी सेमवाल, मदन डुकलान व गिरीश सुन्दरियाल की किताबों पर चर्चा हुई है।समय साक्ष्य लाइव के संचालक, समीक्षक व होस्ट प्रवीन कुमार भट्ट ने बताया कि अब 12 अप्रैल को समय साक्ष्य लाइव नाम की यह श्रंखला समय साक्ष्य के फेसबुक पर लाइव शुरू की गई थी। तब से लेकर 8 मई तक मोहन थपलियाल की सम्पर्ण कहानियां, किस्से मीडिया, मीडिया मुद्दे और चुनौतियां, पत्रकारिता का कबीरपंथ, हिन्दी का मध्यकालीन काव्य, विद्यासागर नौटियाल की प्रतिनिधि कहानियां, कोई एक खिड़की तथा अन्य कहानियां, गौदार की रात, चल मेरे पिट्ठू दुनिया देखें, कालड़ी से केदार, धम्मचक्र के उसपार, भेद खोलेगी बात ही, कैसे-कैसे लोग, महावीर रवांल्टा की प्रतिनिधि कहानियां, गैणी जण अमार सुईन, एक प्रेम कथा का अंत, पहाड़ के बादल, ठुंग्चा, गांव और किसान, अनसुनी आवाज, इनरपास हिमालय, डूबती टिहरी की आखिरी कविताएं, गांव की यादें ट्रेन तक, विद्यासागर नौटियाल के कथा साहित्य में ग्रामीण जनजीवन की अभिव्यक्ति, हिन्दी कहानी के सौ साल तथा भूमण्डोत्तर कहानी, मल्यो की डार, भ्यासकथा तथा अन्य कहानियां, धार का गिदार, लोक पहरूए, पलायन से पहले, कितने रंग की बातें, चीनी नमक और नीम, रास्ते अधूरे नहीं होते, जोहार के स्वर, अपनी माटी अपना बचपन, भयमुक्त बुग्याल तथा अन्य कहानियां, उत्तराखंड होली के लोकरंग, यूरोप के सामी आदिवासी जनजीवन और लोककथाएं, गांव के बयान, फागूदास की डायरी, कुछ काले कुछ उजले पन्ने, गढ़वाली मांगल, पहाड़ी स्त्रियां, अविस्मरणीय यूरोप, रुक जाना नहीं, प्रधानाध्यापकी के ग्यारह वर्ष, दलित साहित्य और महिलाएं, पंचायतों में महिलाएं, उत्तराखंड ज्ञानकोश, हुंगरा व सियासते उत्तराखंड आदि किताबों पर चर्चा हो चुकी है।  समय साक्ष्य लाइव साहित्यकारों और पाठकों को खूब पसंद आ रहा है। देश भर से साहित्यकार व पुस्तक प्रेमी लाइव में जुड़कर पुस्तकों के बारे में चर्चा करते हैं। इस लाइव में प्रतिदिन दुनिया के अलग-अलग भागों के पाठकों के अतिरिक्त लंदन, मुम्बई, दिल्ली, नेपाल, देहरादून, पिथौरागढ़, रुद्रपुर, गोपेश्वर, हल्द्वानी, नरेन्द्रनगर, अल्मोड़ा, पौड़ी, उत्तरकाशी सहित अनेक स्थानों से लोग जुड़ रहे हैं। समय साक्ष्य लाइव चर्चा में अब तक जिन किताबों की चर्चा हुई है उनमें उत्तराखंड मूल के इक्यावन चर्चित साहित्यकारों के साक्षात्कार का संग्र्रह भेद खोलेगी बात ही, विद्यासागर नौटियाल की सम्पूर्ण कहानियां, मोहन थपलियाल की सम्पूर्ण कहानियां आदि पुस्तकें शामिल हैं।लाइव चर्चा में वरिष्ठ कथाकार सुभाष पंत, पूर्व मुख्य सचिव नृप सिंह नपल्च्याल, मुकेश नौटियाल, अनिल कार्की, शादाब अली, महेश पुनेठा, रुचि बहुगुणा उनियाल, विजय भट््ट, शिखा वार्ष्णेय, नीलम नवीन, दिनेश कंडवाल, मनोज इष्टवाल, राजेश पाल, विनोद बग्याल, रीना पंत, मदन मोहन कण्डवाल, जागेश्वर जोशी, रोहित कौशिक, कुसुम भट्ट, भारती पांडे, दिनेश भट्ट, सहित अनेक लेखक व पाठक निरन्तर जुड़ रहे हैं।समय साक्ष्य फेसबुक लाइव के संचालक प्रवीन कुमार भट्ट ने कहा प्रतिदिन आयोजित हो रहा यह लाइव साहित्यकारों और पाठकों के बीच धीरे-धीरे लोकप्रिय हो गया है। डेढ़ से दो घंटे चलने वाली चर्चा में प्रतिदिन 200-700 लोग तक जुड़ जाते हैं। लाइव चर्चा में अब तक कहानी, कविता, उपन्यास, यात्रा वृतांत, पत्रकारिता, सामाजिक सरोकार, समीक्षा, आलोचना, संस्मरण, नाटक सहित लगभग सभी विधाओं पर चर्चा हुई है। उन्होंने कहा कि इस चर्चा को निरन्तर जारी रखा जाएगा।







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